कोरा कागज़ और रंग

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(Photography by : Arif Khan)

(Model in the picture : Rohit Yadav)

मैथिलि और मैं, अकसर रंगो की बातें किया करते थे। वो मुझसे बहुत सवाल करती थी।

पूछती थी, “अगर आसमान नीले की जगह मेरे होठों के रंग का होता, तो तुम बारिश की बूंदों में भीगते, या मेरे लबों से निकले मेरी कविताओं को सुनते?”

और यूँ ही मैं मुस्कुरा कर कह देता था, “बारिश की बूंदों में भीगने का मज़ा ही और है।” फिर उसका रूठता हुआ चेहरा देख, थोड़ा हंस लेता था।

“तुम्हारा क्या रंग है?” वो अक्सर पूछा करती थी।

“वही जो तुम्हारी कविताओं का है।” मैं मुस्कुरा कर कह दिया करता था।

“बेरंग हैं वो। उनका अपना कोई रंग नहीं। जो स्याही का होता है, वही बनजाता है।”

“और तुम्हारा?”

“सफ़ेद,” उसने काफी सोचने के बाद कहा।

“इतने रंगो में से सफ़ेद ही क्यों?”

“थोड़ा समय लो। खुद जान जाओगे।”

थोड़ा समय लिया था। पर वो थोड़ा ना जाने कितना ज़्यादा हो गया है कि मैथिलि कहीं दिखती ही नहीं। उसकी कमी में खुद को पहली दफा बेरंग महसूस किया और समझ आया कि उसका रंग सफ़ेद क्यों है। क्योंकि वो एक कोरे कागज़ की तरह थी, और मैं, एक कविता। जितने रंग महसूस किये उसकी स्याही के ही थे। और आज जब वो नहीं दिखती तो अक्सर उसके रंग को चेहरे पर लगा कर उसे महसूस करने की कोशिश करता हूँ।

अब जब वो आएगी और पूछेगी, “तुम्हारा रंग क्या है?” मैं भी बता दूंगा। “तुम्हारे जाते ही मेरा रंग तुम्हारी कविता का नहीं रहा, वो खुद तुम्हारी तरह सफ़ेद हो गया है।”

बस, तब तक इंतज़ार रहेगा। एक कोरे कागज़ और कुछ रंगो का।

– ईश्वर्या खन्ना