Photograph

I see pixels bursting into words,

And I wonder when will I see your face again,

before I forget- the wrinkles on your skin,

the density of your brows

and your lips bulging inward,

into your mouth.

 

These photographs tremble

when they exhale words,

and look like scribbled pages to me,

sprinkled with question marks,

and grief.

 

I, now, see words bursting into memories.

Reminding me the sound of your giggles,

the smell of your breath,

the noise while you chewed chapatis,

the words you’d eat

every time you’d shout in anger.

 

I see the memories bursting into nothingness,

I wonder where will I find you now.

 

Poetry and Photograph by Eshwarya Khanna

 

(Poet’s note: Pixels bursting into words, words bursting into memories, and memories bursting into nothingness and you lose what you wish to keep forever- memories.

Short poetry dedicated to a really important person who’s not here anymore. I clicked a photograph when I was a kid, and I never knew that this random porridge of pixels will cease to be a photograph one day. 
Sometimes, you wish to suffer from the pain of missing people. What scares you more is the thought of forgetting them. Because only in memories you can meet and spend time with them.)

 

0502).jpg

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Advertisements

कोरा कागज़ और रंग

IMG_9648

(Photography by : Arif Khan)

(Model in the picture : Rohit Yadav)

मैथिलि और मैं, अकसर रंगो की बातें किया करते थे। वो मुझसे बहुत सवाल करती थी।

पूछती थी, “अगर आसमान नीले की जगह मेरे होठों के रंग का होता, तो तुम बारिश की बूंदों में भीगते, या मेरे लबों से निकले मेरी कविताओं को सुनते?”

और यूँ ही मैं मुस्कुरा कर कह देता था, “बारिश की बूंदों में भीगने का मज़ा ही और है।” फिर उसका रूठता हुआ चेहरा देख, थोड़ा हंस लेता था।

“तुम्हारा क्या रंग है?” वो अक्सर पूछा करती थी।

“वही जो तुम्हारी कविताओं का है।” मैं मुस्कुरा कर कह दिया करता था।

“बेरंग हैं वो। उनका अपना कोई रंग नहीं। जो स्याही का होता है, वही बनजाता है।”

“और तुम्हारा?”

“सफ़ेद,” उसने काफी सोचने के बाद कहा।

“इतने रंगो में से सफ़ेद ही क्यों?”

“थोड़ा समय लो। खुद जान जाओगे।”

थोड़ा समय लिया था। पर वो थोड़ा ना जाने कितना ज़्यादा हो गया है कि मैथिलि कहीं दिखती ही नहीं। उसकी कमी में खुद को पहली दफा बेरंग महसूस किया और समझ आया कि उसका रंग सफ़ेद क्यों है। क्योंकि वो एक कोरे कागज़ की तरह थी, और मैं, एक कविता। जितने रंग महसूस किये उसकी स्याही के ही थे। और आज जब वो नहीं दिखती तो अक्सर उसके रंग को चेहरे पर लगा कर उसे महसूस करने की कोशिश करता हूँ।

अब जब वो आएगी और पूछेगी, “तुम्हारा रंग क्या है?” मैं भी बता दूंगा। “तुम्हारे जाते ही मेरा रंग तुम्हारी कविता का नहीं रहा, वो खुद तुम्हारी तरह सफ़ेद हो गया है।”

बस, तब तक इंतज़ार रहेगा। एक कोरे कागज़ और कुछ रंगो का।

– ईश्वर्या खन्ना