सूखा हुआ बगीचा,  और डायरी के खली पन्ने

नफीसा,

लोग कहते हैं कि किसी के इंतज़ार में ख़त लिखना बेवकूफी होती है| क्योंकि जिस इंसान से तुम एक लम्बे समय के बाद मिलते हो, पता नहीं वो वही इंसान रहता है जिसको सोच कर तुमने खत लिखा था या नहीं | क्या पता वो आये या ना आये, और अगर आये, तो पहले की तरह उसी रंग में आएगा जो तुम्हे हमेशा से पसंद था, या अपने साथ नई आदतों और नए शोक का पिटारा लाएगा|

बस आज ये ही सोच रहा हूँ कि जब तुम वापस आओगी, तब पहले जैसी ही होगी या नहीं| सोचता हूँ कि अभी भी तुम जूतों के लेस पहले की तरह बांधती होगी, या फिर अब मुझे फिरसे तुम्हें लेस बांधना सिखाना पड़ेगा| क्या तुम अभी भी मोमोस को उसी शौंक से खाती होगी? और क्या अभी भी तुम उतनी चीज़ें भुला करती हो, जितनी पहले भुला करती थी? क्या आज भी तुम्हारी चोटी उतनी बिखरी हुई होती है जितनी पहले होती थी? क्या तुम अभी वो क्रीम कलर की कुर्ती पहनती हो, जो तुम्हें इतनी पसंद है कि ना जाने लोगो के इतने बार बोलने पर भी तुम उससे पहनना नहीं छोड़ती?

डर मुझे इस बात का नहीं, कि तुम बदल जाओगी| डर तो इस बात का है,कि शायद मैं नहीं बदलूंगा|

परआज खिड़की से झांक कर अपने बगीचे को देखता हूँ तो यही सोचकर मुस्कुराता हूँ, कि किसी भी बाग़ की अगर कली डालकर फूल बनती है, तो सिर्फ फूल नहीं, वो बाग़ भी खिल जाता है| उम्मीद है कि जब तुम लौटोगी, तो उसी खिले हुए फूल कि तरह होगी| और भला जिस बाग़ में फूल खिला हो, वो खुश कैसे नहीं होगा? अगर मुरझाई हुई भी आई, तो अपनी डायरी के पन्नो के बीच में रख लूंगा|

फिलहाल अभी तो तुम्हारे इंतज़ार में खड़ा हूँ| हो सके तो जल्दी आजाना| पता नहीं, ये बाग़ के दरवाज़े कब तक खुले रहेंगे, और ये डायरी कब बंद होगी|

तुम्हारे इंतज़ार में,
वो सूखा हुआ बगीचा,
और डायरी के खली पन्ने|

~  ईश्वर्या खन्ना

(Photography by : Arif Khan )

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